Thursday, 20 September 2018

जीवन में इक बार

(1) लुटतेआए सब इहाँ, जीवन में इक बार |
      जो जग माँही नां लुटा, जानि न पाया सार ||

(2) कछु ऐसे कहि देत जो,कछु नहिं करें बखान |
      प्रथमहिं दुखिया दीन के, दूजहिं देव समान ||

(3) पतित पावनी लालसा, फँसिअ पहर के बीच |
      पिसि पिसि जैहैं अस्थियाँ,हों चहुँ सरिस दधीच ||

(4) प्राननु प्रिय जुहि जीविका,जुआ खेलतहिं जाइ |
     समझौता करनों परै, पग-पग धोख्यौ खाइ ||

(5) पारंगत पर प्रीति में, कथित पवित करि खेल |
      कूटरचित फन्दा कसें, अस्थाई जुरि मेल ||

(6) उर टूटहि मन दुखित भुँइं, खुँइं खुँइं जैहै नेह |
      पुनि पुनि जिअरा खोजिअहि, सगुन शकुन कौ गेह||

(7) बिन बतियाँ बीतहिं दिवस, रतियाँ रति जग माहिं |
      तिल तिल पजरहि जिअरवा, मनवा माँगहि छाँहि ||

(8) भों-भों भँवरा भ्रमर करि, करि पूरौ निज काल |
      बिन जुगलहिं ह्वै सब अहैं, हाल इहाँ बेहाल ||

(9) वाकी बाँकी नजरिया, बाकी बच्यौ न भाव |
      लगता है अब पलटिअहु, बीच भँवर महिं नाव ||

(10) हारें हरि सुमिरन करहिं, मुइ मुइ जैहै मोह |
       झेलन सों वो ना झिलहि, उँह उहि छोह विछोह ||

(11) बैठि जांइ मनु मारि कँह, बस परबस सब जानि |
       थिर करि यापन निमितियाँ, जीवन ह्वै रस खानि||

Sunday, 9 September 2018

अपना तेरी

(1) अपना तेरी में लगे, धीरु भीरु गम्भीर |
      लक्ष्य छाँड़ि इनके लगें सब तरकस के तीर ||

(2) चश्मा रखिहैं दूसरा, पर दरसन के हेत |
      अपनों दीखहि शुभ शुभी, दूजहिंआड़े लेत ||

(3) निन्दा प्रिय पर सख्स की, आपनु प्रेम अगाधि|
      लाखअवगुनी हों चहूँ, तऊ दिखहि बिन ब्याधि ||

(4) अपना अपना नजरिया, अपना अपना राग |
      अपनों नीकौ ही लगहि, चहुँ उगलहि उहि आग ||

(5) कुत्सित सोचहि के धनी, अस धारा के भीरु |
      कैसे कोउ उनसों कहहि, धीरु भीरु गम्भीर ||

(6) पावन सुचिता धारिकहिं, चहुँ अरि हुइ पुरजोर |
      कबहु न छाँड़्यो साथ कूँ, सुमिरहु नित उठि भोर ||

(7) पूँछ न खींचहु नेक की, अपनों स्वारथ देख |
     असल नकल सब ह्वै दिखहि, इतिहासनु के लेख ||

Saturday, 1 September 2018

श्री कृष्ण जन्माष्टमी

(1) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, पावन परम पुनीत |
      माधव सम दूजा नहीं, दीन हीन को मीत ||

(2) वासुदेव औ देवकी, जिनके पितु अरु मात |
      अर्ध रात्रि को जन्म लहि, तारे टूटहिं पात ||

(3) होगी जब सब के लिए, बड़ी खुशी की बात |
      घर घर आकर जन्म लहिं, कान्हा आधी रात ||

(4) नँद नन्दन नँद लाल की, तिरछी नजरि सुजान |
     मात यशोदा ने रखा, उनका प्रति छन ध्यान ||

(5) लालन पालन सब हुआ, नन्द बबा के गेह |
      गोकुल गाय चराइ कें, ग्वाल बाल सों नेह||

(6) शिरोमणी यदुवंश के, जगन्नाथ महाराज |
      सदा आपने है रखी, निज भक्तनु की लाज ||

(7) औसर पावन पर्व पर, लेहु बधाई आप |
      कुँवर कन्हाई की क्रपा, दूरि करहि सन्ताप ||

Wednesday, 15 August 2018

" बेशक हुए स्वतन्त्र "

बेशक हुए स्वतन्त्र आज हम ,पर बिन पर के पंखी हैं|
अनचाही मिल गईं नीतियाँ, अगणित ढपोरशंखी हैं ||

निर्धन का बेड़ा गर्क दिखै, धनवान और धनवान हुए|
पहलू जो छूने चहिए थे,वोअब तक क्यों नहिं गए छुए||

बिपरीत दिशा की बातें कुछ, दिनरात परोसी जाइ रहीं |
आकाश मध्य बिन नीर लिए, बदलीं -बदली सी छाइ रहीं ||

चहुँ आजादी की वर्षगाँठ, चहुँ उत्सव कोई कैसा भी |
ये तभी लगें सबको अच्छे, जब गुजर जोग हो पैसा भी ||

भावना कामना अच्छी हों, तो हाथ सफलता आएगी |
तब भोली भाली जनता भी, बाबख्त रोटियाँ पाएगी ||

Tuesday, 7 August 2018

भ्रूण हत्या ?

नारी,
शक्ति है हमारी |
ऐ विमूढ़!
क्यों नष्ट करवा रहा है भ्रूण?
महा क्षोभ,
अपनी जिंदगी का तो है तुझे लोभ |
आदमी,
यदि ऐसा ही करेगा |
तो,
हर दूसरा आदमी हथेली पर चून धरेगा ||
ऊह -आह,
बता तेरे लड़कों के कहाँ से होंगे ब्याह |
उठ और जाग,
अपनी जिम्मेदारी न भाग!
आने दे लड़की,
तेरी दूर हो जाइगी कड़की!
तू ,
करवा के अल्ट्रासाउंड |
आने वाले को  भी,
लगाने दे इस दुनियां में राउंड ||
चोरा चोरी ,
गर्भ गिरवाता है |
शक्ति पुंज को मरवाता है ||
इससे पैदा होगा त्राण,
बक्स दे उसके प्राण |

Saturday, 4 August 2018

बड़ा ही महत्व है

• कद और कांठी का |
   अच्छी परिपाठी का ||
     लड़ाई में लाठी का |||
       बड़ा ही ............(1)
• नींद में खटिया का |
   झोंपड़ी में टटिया का ||
     स्टेशन हटिया का  |||
        बड़ा ही ...........(2)
• कंगाली में आटे का |
   व्यापार में घाटे का ||
     जूड़ो कराटे का  |||
         बड़ा ही .........(3)
• नदियों में गंगा का |
   करोड़पति भिखमंगा का ||
     सियासत में दंगा का |||
       बड़ा ही ............(4)
• अच्छे नतीजे का |
   न्याय में सी.जे.का ||
     शादी में डी.जे.का |||
       बड़ा ही ............(5)
• लोरी कहानी का |
   ननिहाल में नानी का ||
     जीवन में पानी का  |||
     बड़ा ही ..............(6)
• जंगल में शेर का |
    भूख में बेर का ||
        हेर अरु फेर का |||
          बड़ा ही .........(7)
• सुबह शाम चाय का |
   गरीब की हाय  का ||
     पन्ना सी  धाय का |||
       बड़ा ही ............(8)
• सुनहरे प्रात का |
    दिन और रात का ||
      भैया के  भात का |||
        बड़ा ही ...........(9)

Saturday, 28 July 2018

डर बहुत लगता है

•झूठ के बजार से |
   बजारू अचार से ||
     घूमते गँवार से  |||
        डर बहुत लगता है(1)
•बाबरे  कुत्ता से |
    और कुकुरमुत्ता से ||
      बैगन के भुर्ता  से |||
         डर....................(2)
•अन्धेरी रात से |
      अटपटी बात से ||
         भैया के बाँट से |||
            डर.................(3)
•अजनवी लहू से |
      कटकनी महू से ||
         खटकनी बहू से |||
            डर.................(4)
•रिश्वत की थैली से |
     चूँदरिया मैली से ||
       बड़ी बड़ी रैली से |||
          डर ..................(5)
•हाकिम अरु हुक्का से |
      रहन अरु रूक्का से ||
        मैडम के मुक्का से |||
           डर..................(6)
•बड़े बड़े नाम से |
     और खोटे काम से ||
       सड़क पर जाम से |||
        डर ....................(7)
•पहिया के पंचर से |
     बिल्कुल निरक्षर से ||
       डैंगू के मच्छर से ||
        डर.....................(8)
•हाथी की सूँड़ से |
      और ज्ञान गूढ़ से ||
        आदमी विमूढ़ से |||
          डर..................(9)
•नकली मिलावट से |
      चुनावी अदावट से ||
        बफर की दावत से|||
          डर.................(10)
•कपड़ा कटपीस से |
    बिगड़े रहीस सेे  ||
      बच्चों की फीस से |||
        डर..................(11)
•पैसेंजर रेल से |
    लेटलतीफ मेल से ||
      जानलेवा खेल से |||
        डर..................(12)
•बनावटी प्रीति से |
    बारू की भीति से ||
      ओछी राजनीति से |||
         डर.................(13)
•बुद्धी को मन्द से |
    आफत को फन्द से ||
      भाभी को नंद  से |||
        डर..................(14)
•मोल की मेंहदी से |
   लोटा बिन पैंदी से ||
     लंका के भेदी से |||
       डर ..................(15)
•किसी भी चुनाव से |
    और मनमुटाव से ||
      सड़क के घुमाव से |||
      डर....................(16)
•हँसी और ठट्टा से |
     गुस्सैल पट्ठा से ||
      बिजली के लट्ठा से |||
        डर बहुत लगता है |

Friday, 27 July 2018

" झमझम वर्षा "

वर्षा झमझम हो रही,
मौसम भी परवान |
हवा निराली चल रही,
पंछी गाउत गान ||1||
दिन में अँधियारी झुकी,
बिल्कुल रात समान |
लुका छिपी बदरा करें,
सूरज अंतर ध्यान ||2||
सांय काल में लग रहा,
कबहुं न बरसो नीर |
धूप खिली राहत मिली,
 बदलो रुखहिं समीर ||3||

गुरु महिमा

मात पिता से बढ़कर कोई,
दूजा गुरू नहीं जग में |
इनकी सेवा सुफल दायिनी,
ध्यान रखें जीवन-मग में ||

Friday, 20 July 2018

गोपालदास नीरज (श्रद्धांजलि)

महाकवी गोपालदास के,
दुखद निधन पर दुखी सभी |
स्वर्ग लोक वासी होकर भी,
नहिं भूलेंगे लोग कभी ||
कमी खलेगी युगों -युगों तक,
नीरज की कविताओं की |
सद्विचार व्यवहार पुरोधी,
गीत -माल पविताओं की ||

Thursday, 19 July 2018

बाजरा

सत्तर के दशक की बातें |
वो दिन अरु वो  रातें ||
जब देशी बाजरा बोते थे |
चौ मने पच मने होते थे ||
संग और फसल भी होती थीं |
वे कहीं जाति सब मोटी थीं ||
जुँड़री, ढेंचा फुंसनहिं ग्वार |
सनबीजा बपतहिं हार- हार ||
लोबिया सवाँ भी बोउत थे |
सबके सब पैदा होउत थे ||
उड़द मूँग मोंठा फसलें |
ठेटि देशिया थीं नसलें ||
सैंदा कचरी अरु अन्य चीज |
कुदरती मिले बिन बए बीज||
अब दिखहि फ़कत बजरा बजरा |
इँह बिगरि गयो अजरा सजरा ||

Saturday, 14 July 2018

" बरखा "

बरखा बरखी बखत सों,
सब काहू के हेत |
ओठि बादि जुति जांयगे,
 हर किसान के खेत ||1||
फसलि खरीफी बुवि जहै,
ज्वार बाजरा संग|
कहुँ मकई कहुँ धान की,
छटा  बिखेरहि रंग ||2||
कोऊ रोपहि भाजियाँ,
कोउ विरछ फुलवाड़ |
गन्ध सुगंधा रुपहलिए,
रक्षक शूलहिं झाड़ ||3||
पुनि पुनि बरखा बरखिओ,
सावन भादों कुआर |
हिंअनु हुंअनु अरु सब जगह,
सोंजुर मँझल फुहार ||4||
यदि बदरा अस नीर दहिं,
भरहिं ताल पाताल |
जल स्तर ऊपर उठै,
भुवि जग मालामाल ||5||

Friday, 29 June 2018

अन्तर

गरीबी अमीरी में 
ऐसौ का अन्तरु है, 
जानत भए हू जो,
जाहि नहिं जानत हैं |
मम पेटु हाऊ है 
मैं न जानूँ काहू है, 
धारना धरनहार,
अपनी ही तानत हैं ||
कोउ खातु भरि पेट
कोउ जातु मरि खेत , 
देखत हुए हू कछु , 
ताहि नहिं मानत हैं |
एकु सोतु धरती पै 
एकु वायुयान में ,
अन्तर के जानकार,
मनकी सी छानत हैं ||

Thursday, 28 June 2018

आजकल ?

साँच दुबकती फिर रही,
झूठ दिखै हर ठौर |
उलट बाँसियाँ बजि रहीं,
करै न कोई गौर ||
करै न कोई गौर,
नतीजे नहिं फलदायक |
झूठ रही फलि फूलि,
बनीं चहुँ दिसि खलनायक ||
सोचि समझि कछु लेहु,
फिज़ाएं दिखें सुबकती |
यहाँ वहाँ सब जगह,
फिरि रही साँच दुबकती ||

Monday, 25 June 2018

" शकूँ "

गरीब के करीब ही,
शकूँ की खान है,
अमीर तो बेचेन हमेशा रहा है |
इशारों इशारों में,
नाँच ये जाता है,
चुटकी बजत ही करता कहा है ||
नजरें उठाके,
देखेंगे गर हम,
इसके सर ऊपर से पानी बहा है |
खैर खबर लेवें,
नीती नियंता हू,
गंगा को गरीब भी लेगा नहा है ||

Wednesday, 20 June 2018

" चुभते तीर "

माना कि आमंदनी दो गुनी है गई,
खर्चा भी दिन राति चौ गुने बढ़ि रहे |
घाटौ बहु काम में आगे ही आगे है,
कहानी गढ़न बारे नित नई गढ़ि रहे ||
दोषी निज दोष कूँ अपनों नां मानिकें,
सब के सब दोष इक दूजे पै मढ़ि रहे |
कारौ सौ चश्मा अँखियनु लगाइकें,
अन्धेरी राति में अखरनु कूँ पढ़ि रहे ||

Tuesday, 5 June 2018

किसान की कसक

किसान की कसक कूँ,
कोई नहिं जानता है,
प्रकृति के भरोसे याकी नैया पार होति है |
घड़ियाली आँशू ,
बहाते सब दीखते,
बौहार निभाके छुड़ाते सब छोति है ||
लागति लगति जो,
खेती किसानी में,
पके बादि मिलति नाँहिं,
 बोहू जाहि खोति है |
नीतियाँ बनान बारे,
ए सी बैठि कहत,
भारत में किसान की,
बल्ले बल्ले होति है ||

Friday, 16 March 2018

" बेटी की दशा "

दहेज की खातिर मर रही है बेटी |
पैदा होने के लिए डर रही है बेटी ||
दूल्हा डंके की चोट बिक रहा है |
विरोध कहीं भी नहीं दिख रहा है ||
अधिजन भागे ही भागे जा रहे हैं |
लड़की वाले धोखा खा रहे हैं ||
कहीं लड़की छोटी पड़ रही है |
और कहीं लड़की मोटी पड़ रही है ||
कहीं नज़रें नजा़रे भाँप रहीं हैं |
कहीं फीता लेकर नाँप रहीं हैं ||
ज्ञान -चरित सब गौड़ हो गए |
जाने क्यों हम फ्रौड हो गए ||
अपनी माँ बेशक ठिगनीं हो |
बहन और दुहिता उतनीं हो |
पर -पर दुहिता लंबी चहिए |
इनसे कोई कुछ मत कहिए ||
डींग हाँकते जय हो बेटी |
रकम माँगते हैं भर पेटी ||
छोरा ते छोरी हो गोरी |
और शक्ल की भी हो भोरी ||
लला भलें कदुआ दंसइया |
फिर वो है कुँवर कन्हैया ||
शर्म करहु बिनु बुद्धी बारे |
दिन में दिखा रहे तुम तारे ||
लड़की बारे रोइ रहे हैं |
अपना साहस खोइ रहे हैं ||
बिन दहेज नहिं ब्याह हो रहे |
अधिजन काले सियाह हो रहे ||
दया करहु अरु हया बिसारौ |
मानहुँ हों ऐहसान तिहारौ ||
दहेज लोलुप जो सज्जन हैं |
मम विचार से वो अधिजन हैं ||
चहहि अकेला नाँहि "अकेला "|
सदाचरण का लगिहे मेला ||
बैठि गेह बेटी सिसकेगी |
जन्म लैन में वो हिचकेगी ||

Tuesday, 27 February 2018

होली के रंग

होली के रँग फीके पड़ि गए, आँगें थे वे आँगे बढ़ि गए |
पाँछे थे ते पाँछें रहि गए, तौ का पुरिखा ऐसी कहि गए ||
मूक बने देखत रहियौ, रूख बने टेकत रहियौ |
लिपे -लिपे प्रतिकार करौ,  प्राप्य सबहिं अधिकार धरौ ||
अजहूँ तुहरीं कँह फूटि गईं, क्यूँ लछिमी तुमसों रूठि रहीं |
जब अलग अलग ढप बाजैगौ, तौ कोई कामु न छाजैगौ ||
मिलि झाँझ मृदंग बजाऔ जी, महफिल कूँ खूब सजाऔ जी |
जागरूकता लानी है, होली पवित मनानी है ||
अनचाही फिजां रोकनी है ,नव कील सदां ठोकनी है |
यह भारत देश अनोखा है, सारी दुनियाँ से चोखा है ||
अकबर सिंह अकेला की, अरु होली के मेला की |
अब धूम मचैगी गरमिन तक, कहुँ गोरी कहुँ छैला की ||

Monday, 26 February 2018

होली

नया नहीं कुछ होने वाला, रोज मनाओ होली को |
पहले करो सुरक्षित अपनी, कटने वाली झोली को ||
नया तराना, नया जमाना |नया डराना, नया कमाना ||
नया सलीका, नया तरीका | नया पलीता, नया सरीखा ||
नई बुराई, नई खुमारी |ऐसी तैसी, करी तुम्हारी||
लगता है क्या, आज हो गया | अपनों का मोहताज हो गया ||
चारों ओर अंधेरा छाया |उसका छोर कहीं नहिं पाया ||
बड़े बड़ों की मौज हो रही |पड़वा में भी दौज हो रही ||
छोटे छोटे तरस रहे हैं |बादल भी नहिं बरस रहे हैं ||
बड़े करहिं वो सब कुछ लीला |छोटा करिअहि तो गुड़ गीला ||
गंग आज उलटी बहि रहिहैं |असल बात कोऊ नहिं कहिहैं ||
जो कहुँ साँच बखानन चहिहौ |तौ तुम दूर देश कों रहिहौ ||
चहै न चढ़ि गै अटा अटारी | पातर रहि गै भौत पिछारी ||