होली के रँग फीके पड़ि गए, आँगें थे वे आँगे बढ़ि गए |
पाँछे थे ते पाँछें रहि गए, तौ का पुरिखा ऐसी कहि गए ||
मूक बने देखत रहियौ, रूख बने टेकत रहियौ |
लिपे -लिपे प्रतिकार करौ, प्राप्य सबहिं अधिकार धरौ ||
अजहूँ तुहरीं कँह फूटि गईं, क्यूँ लछिमी तुमसों रूठि रहीं |
जब अलग अलग ढप बाजैगौ, तौ कोई कामु न छाजैगौ ||
मिलि झाँझ मृदंग बजाऔ जी, महफिल कूँ खूब सजाऔ जी |
जागरूकता लानी है, होली पवित मनानी है ||
अनचाही फिजां रोकनी है ,नव कील सदां ठोकनी है |
यह भारत देश अनोखा है, सारी दुनियाँ से चोखा है ||
अकबर सिंह अकेला की, अरु होली के मेला की |
अब धूम मचैगी गरमिन तक, कहुँ गोरी कहुँ छैला की ||
पाँछे थे ते पाँछें रहि गए, तौ का पुरिखा ऐसी कहि गए ||
मूक बने देखत रहियौ, रूख बने टेकत रहियौ |
लिपे -लिपे प्रतिकार करौ, प्राप्य सबहिं अधिकार धरौ ||
अजहूँ तुहरीं कँह फूटि गईं, क्यूँ लछिमी तुमसों रूठि रहीं |
जब अलग अलग ढप बाजैगौ, तौ कोई कामु न छाजैगौ ||
मिलि झाँझ मृदंग बजाऔ जी, महफिल कूँ खूब सजाऔ जी |
जागरूकता लानी है, होली पवित मनानी है ||
अनचाही फिजां रोकनी है ,नव कील सदां ठोकनी है |
यह भारत देश अनोखा है, सारी दुनियाँ से चोखा है ||
अकबर सिंह अकेला की, अरु होली के मेला की |
अब धूम मचैगी गरमिन तक, कहुँ गोरी कहुँ छैला की ||
No comments:
Post a Comment