Saturday, 14 July 2018

" बरखा "

बरखा बरखी बखत सों,
सब काहू के हेत |
ओठि बादि जुति जांयगे,
 हर किसान के खेत ||1||
फसलि खरीफी बुवि जहै,
ज्वार बाजरा संग|
कहुँ मकई कहुँ धान की,
छटा  बिखेरहि रंग ||2||
कोऊ रोपहि भाजियाँ,
कोउ विरछ फुलवाड़ |
गन्ध सुगंधा रुपहलिए,
रक्षक शूलहिं झाड़ ||3||
पुनि पुनि बरखा बरखिओ,
सावन भादों कुआर |
हिंअनु हुंअनु अरु सब जगह,
सोंजुर मँझल फुहार ||4||
यदि बदरा अस नीर दहिं,
भरहिं ताल पाताल |
जल स्तर ऊपर उठै,
भुवि जग मालामाल ||5||

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