Sunday, 9 September 2018

अपना तेरी

(1) अपना तेरी में लगे, धीरु भीरु गम्भीर |
      लक्ष्य छाँड़ि इनके लगें सब तरकस के तीर ||

(2) चश्मा रखिहैं दूसरा, पर दरसन के हेत |
      अपनों दीखहि शुभ शुभी, दूजहिंआड़े लेत ||

(3) निन्दा प्रिय पर सख्स की, आपनु प्रेम अगाधि|
      लाखअवगुनी हों चहूँ, तऊ दिखहि बिन ब्याधि ||

(4) अपना अपना नजरिया, अपना अपना राग |
      अपनों नीकौ ही लगहि, चहुँ उगलहि उहि आग ||

(5) कुत्सित सोचहि के धनी, अस धारा के भीरु |
      कैसे कोउ उनसों कहहि, धीरु भीरु गम्भीर ||

(6) पावन सुचिता धारिकहिं, चहुँ अरि हुइ पुरजोर |
      कबहु न छाँड़्यो साथ कूँ, सुमिरहु नित उठि भोर ||

(7) पूँछ न खींचहु नेक की, अपनों स्वारथ देख |
     असल नकल सब ह्वै दिखहि, इतिहासनु के लेख ||

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