(1) अपना तेरी में लगे, धीरु भीरु गम्भीर |
लक्ष्य छाँड़ि इनके लगें सब तरकस के तीर ||
(2) चश्मा रखिहैं दूसरा, पर दरसन के हेत |
अपनों दीखहि शुभ शुभी, दूजहिंआड़े लेत ||
(3) निन्दा प्रिय पर सख्स की, आपनु प्रेम अगाधि|
लाखअवगुनी हों चहूँ, तऊ दिखहि बिन ब्याधि ||
(4) अपना अपना नजरिया, अपना अपना राग |
अपनों नीकौ ही लगहि, चहुँ उगलहि उहि आग ||
(5) कुत्सित सोचहि के धनी, अस धारा के भीरु |
कैसे कोउ उनसों कहहि, धीरु भीरु गम्भीर ||
(6) पावन सुचिता धारिकहिं, चहुँ अरि हुइ पुरजोर |
कबहु न छाँड़्यो साथ कूँ, सुमिरहु नित उठि भोर ||
(7) पूँछ न खींचहु नेक की, अपनों स्वारथ देख |
असल नकल सब ह्वै दिखहि, इतिहासनु के लेख ||
लक्ष्य छाँड़ि इनके लगें सब तरकस के तीर ||
(2) चश्मा रखिहैं दूसरा, पर दरसन के हेत |
अपनों दीखहि शुभ शुभी, दूजहिंआड़े लेत ||
(3) निन्दा प्रिय पर सख्स की, आपनु प्रेम अगाधि|
लाखअवगुनी हों चहूँ, तऊ दिखहि बिन ब्याधि ||
(4) अपना अपना नजरिया, अपना अपना राग |
अपनों नीकौ ही लगहि, चहुँ उगलहि उहि आग ||
(5) कुत्सित सोचहि के धनी, अस धारा के भीरु |
कैसे कोउ उनसों कहहि, धीरु भीरु गम्भीर ||
(6) पावन सुचिता धारिकहिं, चहुँ अरि हुइ पुरजोर |
कबहु न छाँड़्यो साथ कूँ, सुमिरहु नित उठि भोर ||
(7) पूँछ न खींचहु नेक की, अपनों स्वारथ देख |
असल नकल सब ह्वै दिखहि, इतिहासनु के लेख ||
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