Wednesday, 15 August 2018

" बेशक हुए स्वतन्त्र "

बेशक हुए स्वतन्त्र आज हम ,पर बिन पर के पंखी हैं|
अनचाही मिल गईं नीतियाँ, अगणित ढपोरशंखी हैं ||

निर्धन का बेड़ा गर्क दिखै, धनवान और धनवान हुए|
पहलू जो छूने चहिए थे,वोअब तक क्यों नहिं गए छुए||

बिपरीत दिशा की बातें कुछ, दिनरात परोसी जाइ रहीं |
आकाश मध्य बिन नीर लिए, बदलीं -बदली सी छाइ रहीं ||

चहुँ आजादी की वर्षगाँठ, चहुँ उत्सव कोई कैसा भी |
ये तभी लगें सबको अच्छे, जब गुजर जोग हो पैसा भी ||

भावना कामना अच्छी हों, तो हाथ सफलता आएगी |
तब भोली भाली जनता भी, बाबख्त रोटियाँ पाएगी ||

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