सत्तर के दशक की बातें |
वो दिन अरु वो रातें ||
जब देशी बाजरा बोते थे |
चौ मने पच मने होते थे ||
संग और फसल भी होती थीं |
वे कहीं जाति सब मोटी थीं ||
जुँड़री, ढेंचा फुंसनहिं ग्वार |
सनबीजा बपतहिं हार- हार ||
लोबिया सवाँ भी बोउत थे |
सबके सब पैदा होउत थे ||
उड़द मूँग मोंठा फसलें |
ठेटि देशिया थीं नसलें ||
सैंदा कचरी अरु अन्य चीज |
कुदरती मिले बिन बए बीज||
अब दिखहि फ़कत बजरा बजरा |
इँह बिगरि गयो अजरा सजरा ||
वो दिन अरु वो रातें ||
जब देशी बाजरा बोते थे |
चौ मने पच मने होते थे ||
संग और फसल भी होती थीं |
वे कहीं जाति सब मोटी थीं ||
जुँड़री, ढेंचा फुंसनहिं ग्वार |
सनबीजा बपतहिं हार- हार ||
लोबिया सवाँ भी बोउत थे |
सबके सब पैदा होउत थे ||
उड़द मूँग मोंठा फसलें |
ठेटि देशिया थीं नसलें ||
सैंदा कचरी अरु अन्य चीज |
कुदरती मिले बिन बए बीज||
अब दिखहि फ़कत बजरा बजरा |
इँह बिगरि गयो अजरा सजरा ||
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