गरीबी अमीरी में
ऐसौ का अन्तरु है,
जानत भए हू जो,
जाहि नहिं जानत हैं |
मम पेटु हाऊ है
मैं न जानूँ काहू है,
धारना धरनहार,
अपनी ही तानत हैं ||
कोउ खातु भरि पेट
कोउ जातु मरि खेत ,
देखत हुए हू कछु ,
ताहि नहिं मानत हैं |
एकु सोतु धरती पै
एकु वायुयान में ,
अन्तर के जानकार,
मनकी सी छानत हैं ||
No comments:
Post a Comment