Friday, 16 March 2018

" बेटी की दशा "

दहेज की खातिर मर रही है बेटी |
पैदा होने के लिए डर रही है बेटी ||
दूल्हा डंके की चोट बिक रहा है |
विरोध कहीं भी नहीं दिख रहा है ||
अधिजन भागे ही भागे जा रहे हैं |
लड़की वाले धोखा खा रहे हैं ||
कहीं लड़की छोटी पड़ रही है |
और कहीं लड़की मोटी पड़ रही है ||
कहीं नज़रें नजा़रे भाँप रहीं हैं |
कहीं फीता लेकर नाँप रहीं हैं ||
ज्ञान -चरित सब गौड़ हो गए |
जाने क्यों हम फ्रौड हो गए ||
अपनी माँ बेशक ठिगनीं हो |
बहन और दुहिता उतनीं हो |
पर -पर दुहिता लंबी चहिए |
इनसे कोई कुछ मत कहिए ||
डींग हाँकते जय हो बेटी |
रकम माँगते हैं भर पेटी ||
छोरा ते छोरी हो गोरी |
और शक्ल की भी हो भोरी ||
लला भलें कदुआ दंसइया |
फिर वो है कुँवर कन्हैया ||
शर्म करहु बिनु बुद्धी बारे |
दिन में दिखा रहे तुम तारे ||
लड़की बारे रोइ रहे हैं |
अपना साहस खोइ रहे हैं ||
बिन दहेज नहिं ब्याह हो रहे |
अधिजन काले सियाह हो रहे ||
दया करहु अरु हया बिसारौ |
मानहुँ हों ऐहसान तिहारौ ||
दहेज लोलुप जो सज्जन हैं |
मम विचार से वो अधिजन हैं ||
चहहि अकेला नाँहि "अकेला "|
सदाचरण का लगिहे मेला ||
बैठि गेह बेटी सिसकेगी |
जन्म लैन में वो हिचकेगी ||

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