Tuesday, 5 June 2018

किसान की कसक

किसान की कसक कूँ,
कोई नहिं जानता है,
प्रकृति के भरोसे याकी नैया पार होति है |
घड़ियाली आँशू ,
बहाते सब दीखते,
बौहार निभाके छुड़ाते सब छोति है ||
लागति लगति जो,
खेती किसानी में,
पके बादि मिलति नाँहिं,
 बोहू जाहि खोति है |
नीतियाँ बनान बारे,
ए सी बैठि कहत,
भारत में किसान की,
बल्ले बल्ले होति है ||

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