1. खेत लहलहे गेहूं जौ के,
नोट पुराने चलते सौ के।
बछरी बछरा कूदत फांदत,
नन्द नंदन वो माता गौ के।।
हमने *
2.चना मटर औ सरसों दूंआं,
आग लगे पर निकले धूंआं।
प्यासे पथिक भटकते फिरते,
मिलें कहां पानी के कूंआं।।
हमने*
3.गाजर मूली मैथी पालक,
गली गिरारे खेलत बालक।
सैन मटक्का चोर उचक्के,
रैन अंधेरी के घर घालक।।
हमने*
4.हर किसान के खेतहिं आलू,
चरखा खूब चलाते भालू।
स्वांग तमासे के वो जोकर,
होते थे जो बेहद चालू ।।
हमने*
5.खेतऔर खलिहान किसानू,
बरखा ॠतु के विविध विषानू।
गौचारन के समय शाम को,
विचरन करते फिरहिं विहानूं।
हमने*
6.भादों ज्वार बाजरा मक्का,
दाएं बाएं बुढ़रू कक्का ।
नामे बैल खड़ी गाड़ी में,
लोग मारते झुककर धक्का।।
हमने*
7. शीतकाल की लम्बी रातें,
बाबा दादी की बहु बातें,
दुहत दूध काढ़न बारिनु में,
अनचाहे पड़ती थीं लातें।।
हमने*
8. फागुन मास हुरारी होरीं,
कहूं बहुत कहुं थोरीं थोरीं।
मांटी धूरि गुबरिया कीचड़,
गिरत शराबी मोरीं मोरीं ।।
हमने*
9. गांव गांव में लगते दंगल,
गीत मीत मन भाउन मंगल,
यत्र तत्र सर्वत्र खड़े थे,
हरे भरे मनचंगी जंगल।।
हमने*
नोट पुराने चलते सौ के।
बछरी बछरा कूदत फांदत,
नन्द नंदन वो माता गौ के।।
हमने *
2.चना मटर औ सरसों दूंआं,
आग लगे पर निकले धूंआं।
प्यासे पथिक भटकते फिरते,
मिलें कहां पानी के कूंआं।।
हमने*
3.गाजर मूली मैथी पालक,
गली गिरारे खेलत बालक।
सैन मटक्का चोर उचक्के,
रैन अंधेरी के घर घालक।।
हमने*
4.हर किसान के खेतहिं आलू,
चरखा खूब चलाते भालू।
स्वांग तमासे के वो जोकर,
होते थे जो बेहद चालू ।।
हमने*
5.खेतऔर खलिहान किसानू,
बरखा ॠतु के विविध विषानू।
गौचारन के समय शाम को,
विचरन करते फिरहिं विहानूं।
हमने*
6.भादों ज्वार बाजरा मक्का,
दाएं बाएं बुढ़रू कक्का ।
नामे बैल खड़ी गाड़ी में,
लोग मारते झुककर धक्का।।
हमने*
7. शीतकाल की लम्बी रातें,
बाबा दादी की बहु बातें,
दुहत दूध काढ़न बारिनु में,
अनचाहे पड़ती थीं लातें।।
हमने*
8. फागुन मास हुरारी होरीं,
कहूं बहुत कहुं थोरीं थोरीं।
मांटी धूरि गुबरिया कीचड़,
गिरत शराबी मोरीं मोरीं ।।
हमने*
9. गांव गांव में लगते दंगल,
गीत मीत मन भाउन मंगल,
यत्र तत्र सर्वत्र खड़े थे,
हरे भरे मनचंगी जंगल।।
हमने*
No comments:
Post a Comment