Wednesday, 25 March 2020

छेड़-छाड़

जब जब प्रकृति सों
छेड़-छाड़ होवहीं।
      तब तब अपना वो
      मूल भाव खोवहीं।।
गेह गांव प्रदेश देश
छांड़ि कहं कढ़ि जहीं।
      परदूषन पर-दूखन
      भार प्रसार बढ़िअहीं।।
वन वृक्ष काटि कैं
कष्ट भ्रष्ट प्रदत्तहीं।
      सोच पोच लोच ना
       अग्रमे प्रमत्तहीं ।।
नद्य नीर क्षीर सम
विषम भाव राखहीं।
        नेति नेमि नष्ट भुवि
        नीरसास भाखहीं।।
अपथ सत पगपथी
असत मत फलित ज्वै।
       कर्मशील शीतलै
      अकर्मशील ज्वलित ह्वै।।
जहं चहै उहं नहींं
मोदिनी धारना ।
       श्रमपुंजनूं करहु
       मनामंजु वारना।।

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