Saturday, 28 July 2018

डर बहुत लगता है

•झूठ के बजार से |
   बजारू अचार से ||
     घूमते गँवार से  |||
        डर बहुत लगता है(1)
•बाबरे  कुत्ता से |
    और कुकुरमुत्ता से ||
      बैगन के भुर्ता  से |||
         डर....................(2)
•अन्धेरी रात से |
      अटपटी बात से ||
         भैया के बाँट से |||
            डर.................(3)
•अजनवी लहू से |
      कटकनी महू से ||
         खटकनी बहू से |||
            डर.................(4)
•रिश्वत की थैली से |
     चूँदरिया मैली से ||
       बड़ी बड़ी रैली से |||
          डर ..................(5)
•हाकिम अरु हुक्का से |
      रहन अरु रूक्का से ||
        मैडम के मुक्का से |||
           डर..................(6)
•बड़े बड़े नाम से |
     और खोटे काम से ||
       सड़क पर जाम से |||
        डर ....................(7)
•पहिया के पंचर से |
     बिल्कुल निरक्षर से ||
       डैंगू के मच्छर से ||
        डर.....................(8)
•हाथी की सूँड़ से |
      और ज्ञान गूढ़ से ||
        आदमी विमूढ़ से |||
          डर..................(9)
•नकली मिलावट से |
      चुनावी अदावट से ||
        बफर की दावत से|||
          डर.................(10)
•कपड़ा कटपीस से |
    बिगड़े रहीस सेे  ||
      बच्चों की फीस से |||
        डर..................(11)
•पैसेंजर रेल से |
    लेटलतीफ मेल से ||
      जानलेवा खेल से |||
        डर..................(12)
•बनावटी प्रीति से |
    बारू की भीति से ||
      ओछी राजनीति से |||
         डर.................(13)
•बुद्धी को मन्द से |
    आफत को फन्द से ||
      भाभी को नंद  से |||
        डर..................(14)
•मोल की मेंहदी से |
   लोटा बिन पैंदी से ||
     लंका के भेदी से |||
       डर ..................(15)
•किसी भी चुनाव से |
    और मनमुटाव से ||
      सड़क के घुमाव से |||
      डर....................(16)
•हँसी और ठट्टा से |
     गुस्सैल पट्ठा से ||
      बिजली के लट्ठा से |||
        डर बहुत लगता है |

Friday, 27 July 2018

" झमझम वर्षा "

वर्षा झमझम हो रही,
मौसम भी परवान |
हवा निराली चल रही,
पंछी गाउत गान ||1||
दिन में अँधियारी झुकी,
बिल्कुल रात समान |
लुका छिपी बदरा करें,
सूरज अंतर ध्यान ||2||
सांय काल में लग रहा,
कबहुं न बरसो नीर |
धूप खिली राहत मिली,
 बदलो रुखहिं समीर ||3||

गुरु महिमा

मात पिता से बढ़कर कोई,
दूजा गुरू नहीं जग में |
इनकी सेवा सुफल दायिनी,
ध्यान रखें जीवन-मग में ||

Friday, 20 July 2018

गोपालदास नीरज (श्रद्धांजलि)

महाकवी गोपालदास के,
दुखद निधन पर दुखी सभी |
स्वर्ग लोक वासी होकर भी,
नहिं भूलेंगे लोग कभी ||
कमी खलेगी युगों -युगों तक,
नीरज की कविताओं की |
सद्विचार व्यवहार पुरोधी,
गीत -माल पविताओं की ||

Thursday, 19 July 2018

बाजरा

सत्तर के दशक की बातें |
वो दिन अरु वो  रातें ||
जब देशी बाजरा बोते थे |
चौ मने पच मने होते थे ||
संग और फसल भी होती थीं |
वे कहीं जाति सब मोटी थीं ||
जुँड़री, ढेंचा फुंसनहिं ग्वार |
सनबीजा बपतहिं हार- हार ||
लोबिया सवाँ भी बोउत थे |
सबके सब पैदा होउत थे ||
उड़द मूँग मोंठा फसलें |
ठेटि देशिया थीं नसलें ||
सैंदा कचरी अरु अन्य चीज |
कुदरती मिले बिन बए बीज||
अब दिखहि फ़कत बजरा बजरा |
इँह बिगरि गयो अजरा सजरा ||

Saturday, 14 July 2018

" बरखा "

बरखा बरखी बखत सों,
सब काहू के हेत |
ओठि बादि जुति जांयगे,
 हर किसान के खेत ||1||
फसलि खरीफी बुवि जहै,
ज्वार बाजरा संग|
कहुँ मकई कहुँ धान की,
छटा  बिखेरहि रंग ||2||
कोऊ रोपहि भाजियाँ,
कोउ विरछ फुलवाड़ |
गन्ध सुगंधा रुपहलिए,
रक्षक शूलहिं झाड़ ||3||
पुनि पुनि बरखा बरखिओ,
सावन भादों कुआर |
हिंअनु हुंअनु अरु सब जगह,
सोंजुर मँझल फुहार ||4||
यदि बदरा अस नीर दहिं,
भरहिं ताल पाताल |
जल स्तर ऊपर उठै,
भुवि जग मालामाल ||5||